Sat. Jul 2nd, 2022

राजस्थान में अनुपमा तिवाड़ी अब तक 22 हजार 725 पौधें लगा चुकी हैं। जबकि इनका लक्ष्य 1 लाख पौधारोपण का है। उन्हें अब तक बेटी सृष्टि रत्न अवार्ड, पर्यावरण पुरस्कार, फ्यूचर ऑफ द वुमन अवार्ड और लेखन के लिए प्रतिलिपि कथा समान और राजस्थान कवयित्री सम्मान भी मिल चुका है। 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) मनाया जाता है। आइए इस अवसर पर जानते हैं अनुपमा के जीवन की कहानी।

अनुपमा के पिता विजय कुमार तिवाड़ी राजस्थान में दौसा जिले के बांदीकुई कस्बे में रेलवे में एक मेलगार्ड थे। रेलवे का बड़ा सा बंगला था। उनके घर में मोगरा, गुलाब, मधुमालती, चमेली, बेलिया, नीम, जामुन तमाम तरह के पेड़ थे। पौधों की देखभाल के लिए माली आने के बावजूद अनुपमा के पिता स्वयं पेड़-पौधों की देखभाल करते। उनके साथ छोटी अनुपमा भी लगी रहतीं। बाल्टी से फूलों और पेड़ों को पानी डालती रहतीं। उनकी मां भी छोटे पौधों को लगाती थीं। पेड़-पौधों के प्रति लगाव उन्हें विरासत में मिला। 

अनुपमा हरियाली में बीते बचपन को याद करते हुए बताती हैं, घर से सौ फीट की दूरी पर हमारा गेट था। वहां दोनों तरफ इतने सुंदर फूल और पेड़ लगे हुए थे कि हर कोई जब इनके बीच से गुजरता, तो इन्हें निहारना न भूलता।बाद में जयपुर शिफ्ट करने और शादी होने के बाद कई सालों तक घर में बहुत अधिक जगह नहीं होने के कारण वे पेड़-पौधे नहीं लगा पाती थीं, जिसकी कमी उन्हें हमेशा खलती।

शमी नंदा ने सार्वजनिक जगहों पर पेड़ लगाने की दी प्रेरणा

जयपुर के जगतपुरा में अनुपमा और उनके पति कमल ने खुद का मकान बनाया। वहां कम जगह होते हुए भी उन लोगों ने नींबू, चीकू, अमरूद, अनार आदि के पेड़ लगा लिए। अनुपमा बताती हैं, हमारे एक परिचित शमी नंदा का घर जयपुर के राजा पार्क में है। वे एक बार मेरे घर आए, तो उन्होंने बताया कि घर के बगल वाले सार्वजनिक पार्क में उन्होंने कई सारे पेड़ लगाए हैं। मैं अपने बेटे के साथ उन पेड़ों को देखने गई। काफी मेहनत करने के बाद वे पेड़ हरे-भरे और बहुत खूबसूरत लग रहे थे। उसी समय मेरे दिमाग में यह बात आई कि पेड़ कहीं भी धरती पर लगाए जाएं, वे सभी जगह शुद्ध हवा देते रहते हैं। 

फूल-फल देने के साथ-साथ ऑक्सीजन और छाया भी देते हैं। पेड़ों पर पक्षी अपने घोंसले भी बनाते हैं। उसी दिन से मैं पर्यावरण के प्रति और अधिक जागरूक हो गई और तभी से मेरी यह यात्रा शुरू हो गई।

हार न मानने की जिद

घर आने के बाद अनुपमा अपने मिशन में जुट गईं। अपने घर के बगल वाले पार्क और गली में उन्होंने पौधे लगाने शुरू कर दिए। लोग उन्हें बेवकूफ समझते। पौधों को पानी देने के लिए जब वे धूप में बाल्टी में पानी लेकर घर से बाहर निकलतीं, तो लोग उनकी हंसी उड़ाते। फिर भी वे छह महीने तक उन 30 पौधों में लगातार पानी डालने जाती रहीं। लेकिन बकरियाें द्वारा चट कर लिए जाने के कारण उनका लगाया एक भी पौधा नहीं बच पाया। अनुपमा कहती हैं, जब मेरे बेटे ने इस बात की मुझे सूचना दी, तो मुझे बहुत तेज गुस्सा आया। पर मैंने अपने गुस्से पर काबू रखा। मैंने हार नहीं मानी और अपनी कोशिश को बरकरार रखा। मैंने दोबारा 17 पौधे लगाए, जिनमें से सिर्फ 4 बचे, जो अब पेड़ हो गए हैं।” 

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अनुपमा तिवाड़ी अपने काम के कारण ट्री वुमन के नाम से जानी जाती हैं।

बाद के सालों में अनुपमा जब टोंक जिले में स्थानांतिरत होकर आईं, तो अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को ज्वाइन कर लिया। प्रोफेशनली अनुपमा टीचर्स ट्रेनिंग देती हैं। अपने काम के क्रम में जब उन्हें स्कूल जाना पड़ता था, तो वे यह देखने की कोशिश करतीं कि ऐसी कौन सी जगह है, जहां स्कूल की अपनी बाउंड्री, गेट और पानी की व्यवस्था है। वे पता करने की कोशिश करतीं कि स्कूल में कौन-से टीचर पेड़-पौधों को लेकर जागरूक हैं। फिर वे उन स्कूलों में अपने हाथों से पेड़ लगातीं। 

अब तक वे पुलिस चौकी, स्टेडियम, बस स्टैंड, सड़क – तालाब के किनारे, ऑफिस, सरकारी और प्राइवेट स्कूलों, कॉलेज, अस्पताल यहां तक कि लोगों के घरों में कुल 22 हजार 725 पौधें लगा चुकी हैं। इनमें से 5 हजार से अधिक पौधे अब छायादार, फलदार वृक्ष बन चुके हैं। वे खुश होकर बताती हैं कि उन्होंने बरगद, पीपल, गूलर, नीम, हरसिंगार, सुरेल, अर्जुन, गुलमोहर, अनार, अमरुद, आंवला, जामुन, मेहंदी, सदाबहार, चांदनी, गुड़हल, बेलपत्र, सीताफल, कचनार आदि जैसे पेड़ों को लगाया है।  

पेड़-पौधों को मानती हूं अपनी संतान

मेरे पेड़ को कोई नुकसान पहुंचाता है, तो मुझे दुख और गुस्सा दोनों आता है। मेरे बच्चों की तरह हैं मेरे पेड़। उन्होंने एक घटना के बारे में बताया कि एक बार मैंने अंबेडकर स्टेडियम के पास गुलमोहर का पेड़ लगाया। वहां ठेले वाला कोल्ड ड्रिंक्स की बोतल धोकर पानी पेड़ की जड़ में डाल देता, जिससे वह पेड़ सूख गया। इसी तरह वहां माॅर्निंग वॉक के लिए आए लोग नीम के छोटे-से पेड़ के तनों को तोड़ लेते, जिससे वह भी सूख गया। एक बार शराब की दुकान के बाहर मैंने पौधे लगाने की बात की, तो लोगों ने हाथ से बताकर दूर लगाने को कहा। मैंने उन लोगों को कनविंस कर पेड़ लगा तो दिया, लेकिन आज पौधे का नामोनिशान नहीं है। फिर मैंने तय किया कि जहां पौधे बड़े हो सकते हैं, मुझे वहीं लगाने चााहिए। मैंने एक ही जगह कई-कई बार पेड़ लगाए।

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पेड़-पौधों को अपनी संतान की तरह प्यार करती हैं अनुपमा।

ऑफिस से छुट्टी लेकर लगाती हैं पौधे

ऑफिस से बकायदा छुट्टी लेकर पौधे लगाती हूं। वन विभाग और प्राइवेट नर्सरी वालों से काफी तर्क-वितर्क करना पड़ता है। लोग सोचते हैं कि मुझे पेड़ लगाने के लिए पैसे मिलते होंगे। इसलिए वे पूछते भी हैं कि आपको पेड़ लगाने से क्या फायदा मिलता है? मैं कहती हूं कि टीचर्स ट्रेनिंग देना मेरा काम है। ये मैं आत्मिक खुशी के लिए करती हूं। कभी-कभी तो पूरी सैलरी इन पौधों पर खर्च हो जाती है। रात के ग्यारह बजे तक घर लौट पाती हूं। यह काम मुश्किल है। लोगों को समझाना कठिन है। वन विभाग के रेंजर्स सरकारी लेटर लिखवाने को कहते हैं। 38 सौ रुपये तो सिर्फ पिकअप के लिए देना पड़ता है। 

अनुपमा कुछ इस तरह से सोचती हैं कि एक पेड़ लगाने पर एक लाख फायदे बो दिए जाते हैं। शुद्ध हवा, ऑक्सीजन, फल-यही तो है सबसे बड़ा सुख। वे बताती हैं कि पेड़ की वजह से मैं कई सारे लोगों से मिल पाई। उन अनुभवों पर आधारित कहानियां-कविताएं लिख पाई। कई सारी घटनाओं की याद है मेरे पास। लोग हमेशा मेरे द्वारा लगाए गए वृक्ष की फोटो भेजते हैं। उनकी छाया और उनके फल को पाकर बेहद खुश होकर फोन, वाट्सएप मैसेज करते हैं। बिजली नहीं रहने पर मेरे लगाए गए पेड़ की छाया में बैठते हैं। यह सब देख-सुनकर बेहद खुशी होती है।

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अपने हाथों से लगाती हैं पेड़। लोगों को पेड़ों से प्यार करना सिखाती हैं।

पेड़ लगाने के अलावा हैं कई और सामाजिक काम

अनुपमा का लक्ष्य 1 लाख पेड़ों को लगाना है। उनके पति भी पर्यावरण को बचाने की उनकी इस मुहिम में उनका साथ देते हैं। उन दोनों ने जयपुर के ‘सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज’ में शरीर दान के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। वे दोनों मृत्यु के बाद भी किसी के काम आना चाहते हैं। दोनों ने अपने नेत्र दान के लिए भी रजिस्ट्रेशन कराया है। 

अनुपमा अभी तक 11 बार रक्तदान कर चुकी हैं। सौ बच्चों को उन्होंने यूनिफौर्म डोनेट किया है। किशोर गृह, महिला सुरक्षा गृह, बाल सुधार गृह में 1 हजार पुस्तकों का दान किया। उन्होंने 10 हजार डाइट दान देने का संकल्प लिया था, जिसमें 6 हजार आठ सौ डाइट का वह दान कर चुकी हैं। 

वे कहती हैं कि संकल्प आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मेरी जरूरतें बहुत कम हैं। मैं जिस कमरे में रहती हूं, सिर्फ एक टेबल फैन है। मुझे कूलर और एसी नहीं चाहिए। पहनने के लिए भी कम कपड़े चाहिए। मुझे सस्ती चीजें पसंद आती हैं, इसलिए मैं पेड़ों पर खर्च कर पाती हूं।

पर्यावरण तो हर जीव का मुद्​दा

विश्व पर्यावरण दिवस पर संपूर्ण मानवता को संदेश देते हुए अनुपमा कहती हैं, अपने आसपास पेड़ जरूर लगाएं। पेड़ ही वातावरण को शुद्ध रख सकते हैं। पर्यावरण तो हर जीव का मुद्​दा है, लेकिन सिर्फ मनुष्य ही इसके लिए काम कर सकता है। पेड़ काटे जाने की वजह से पानी की कमी हो गई है। पेड़ तो जीवन भर मनुष्य को देते ही रहते हैं। शुरुआत में बस डेढ-दो साल उनकी देखभाल करनी चाहिए। सड़क-तालाब के किनारे बरगद के पेड़ लगाने चाहिए, जो कम से कम पांच सौ साल जीता है और ऑक्सीजन देता रहता है।   

 

 

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