Wed. Feb 8th, 2023
आजमगढ़ मॉडल से मिलेगी 2024 लोकसभा चुनाव के लिए BSP को संजीवनी, मुस्लिम वोटरों को समटने पर अब फोकस; प्लान में SP अटका सकती है रोड़े

मायावती और अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

Image Credit source: टीवी9 भारतवर्ष

बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने साफ कहा है कि बीएसपी के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और पार्टी प्रत्याशी शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली ने आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव जिस संघर्ष और दिलेरी के साथ लड़ा है, उसे आगे 2024 लोकसभा चुनाव तक जारी रखने जरूरी है.

समाजवादी पार्टी (एसपी) का गढ़ कहे जाने वाले आजमगढ़ (Azamgarh) का किला ध्वस्त हो चुका है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) उम्मीदवार दिनेश लाल यादव निरहुआ ने एसपी के उम्मीदवार और अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को कांटे के मुकाबले में मात दे दी. बीजेपी उम्मीदवार निरहुआ ने सिर्फ 8 हजार वोटों से एसपी कैंडिडेट धर्मेंद्र यादव को हराया. बीजेपी उम्मीदवार निरहुआ को 3 लाख 12 हजार वोट मिले, तो एसपी के धर्मेंद्र यादव को 3 लाख 4 हजार मत मिले. दरअसल, बीएसपी उम्मीदवार शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को मिले 2 लाख 66 हजार वोटों ने आजमगढ़ में सभी समीकरण को ध्वस्त कर दिया.

गुड्डू जमाली भले ही चुनाव हार गए हों…लेकिन हार का गम बीएसपी के खेमे में नहीं दिख रहा है. अलबत्ता इस परिणाम को बीएसपी चीफ मायावती अपने पक्ष में मान रही हैं. विधानसभा चुनावों के बाद पहली बार मायावती जोश में दिख रही हैं. माना जा रहा है कि आजमगढ़ में गुड्डू जमाली को दलितों के साथ ही बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट भी मिले हैं. मुस्लिम वोट बीएसपी के पक्ष में जाने से जहां मामूली वोटों से एसपी को हार का मुंह देखना पड़ा तो बीएसपी को इसमें 2024 के चुनावों में फिर से उठ खड़ा होने का रास्ता भी दिख रहा है. परिणाम आने के बाद मायावती ने ट्वीट कर अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरा और अभी से मिशन-2024 के लिए तैयारी करने को कह दिया. मायावती ने आजमगढ़ का उदाहरण देते हुए बीजेपी के सामने खुद को मुख्य विपक्षी दल बताते हुए इशारों में मुस्लिम मतदाताओं को भी बीएसपी की तरफ रिझाने की कोशिश की.

2024 लोकसभा चुनाव तक मुस्तैदी जरूरी

मायावती ने ट्वीट कर लिखा कि बीएसपी के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और पार्टी प्रत्याशी शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली ने आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव जिस संघर्ष व दिलेरी के साथ लड़ा है, उसे आगे 2024 लोकसभा चुनाव तक जारी रखने के संकल्प के तहत चुनावी मुस्तैदी बनाए रखना भी जरूरी है. सिर्फ आजमगढ़ ही नहीं बल्कि बीएसपी की पूरे यूपी में 2024 लोकसभा आम चुनाव के लिए जमीनी तैयारी को वोट में बदलने के लिए भी संघर्ष व प्रयास लगातार जारी रखना है. इस क्रम में एक समुदाय विशेष को आगे होने वाले सभी चुनावों में गुमराह होने से बचाना भी बहुत जरूरी है. यूपी के इस उपचुनाव परिणाम ने एक बार फिर से यह साबित किया है कि केवल बीएसपी में ही यहां बीजेपी को हराने की सैद्धान्तिक व जमीनी शक्ति है. यह बात पूरी तरह से खासकर समुदाय विशेष को समझाने का पार्टी का प्रयास लगातार जारी रहेगा, ताकि प्रदेश में बहुप्रतीक्षित राजनीतिक परिवर्तन हो सके.

2007 से गिरता गया बीएसपी का चुनावी ग्राफ

आजमगढ़ का चुनाव परिणाम और इससे बीएसपी को संजीवनी मिलने की वजह समझने के लिए आप को सबसे पहले यूपी का चुनावी इतिहास और इसमें पार्टी के उतार चढ़ाव को समझना पड़ेगा. साल 2007 के विधानसभा चुनावों में बीएसपी ने अपना सबसे बेस्ट परफॉर्मेंस दिया था. बीएसपी ने अपने दम पर 206 सीटें जीती थीं और दशकों बाद यूपी में किसी दल ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. बीएसपी की जीत में उसके कोर वोट बैंक यानि की दलित, अपरकॉस्ट में ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. लेकिन इस जीत को आखिरी अंजाम तक पहुंचाने में मुस्लिम वोटरों का भी अहम योगदान था. मुस्लिम, ब्राह्मण और दलित वोटरों के कॉम्बिनेशन ने बीएसपी को अजेय बना दिया था. मायावती ने भी दलित और मुस्लिम वोट के इस गठजोड़ को मजबूत करने की हर कोशिश की. हालांकि, मायावती की ये कोशिश बहुत परवान न चढ़ सकी. साल 2009 के लोकसभा चुनावों में यूपी के मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया, तो साल 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुस्लिमों ने लामबंदी दिखाई. कुल मिलाकर यूपी का मुस्लिम हर चुनाव में मजबूत सेक्युलर दल की तरफ मुड़ जाता है.

साल 2017 के विधानसभा चुनावों में बीएसपी ने यूपी में 100 से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया. मतलब बीएसपी का हर चौथा उम्मीदवार एक मुस्लिम था. बीएसपी के इस दांव से मायावती को तो खास फायदा नहीं हुआ, लेकिन इससे एसपी को जरूर नुकसान पहुंचा. विधानसभा में बीएसपी को सिर्फ 19 सीटें मिली. साल 2019 के लोकसभा से ठीक पहले बीएसपी और एसपी, दोनों दल ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा. बीजेपी के खिलाफ बीएसपी को मुस्लिम मत मिलते हैं और इसका फायदा उसकी बढ़ी सीटों में दिखता है. इन चुनावों में एसपी को जहां 5 सीटें मिलती हैं, तो वहीं बीएसपी को उससे दोगुनी 10 सीटें मिलती हैं. अब आता है, साल 2022 का विधानसभा चुनाव. इस चुनाव में बीएसपी ने अपना सबसे खराब प्रदर्शन करने का रिकॉर्ड बना दिया. 403 सीटों में से बीएसपी को सिर्फ 1 सीट मिली. बीएसपी के अकेले जीते विधायक की जीत में पार्टी का कम और उम्मीदवार का अपना रसूख ज्यादा था.

आजमगढ़ में मुस्लिमों ने BSP को वोट दिया ?

अब वापस आते हैं…आजमगढ़ उपचुनाव पर, विधायक चुने जाने के बाद अखिलेश यादव ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया. मतलब आजमगढ़ में उपचुनाव तय था. उपचुनावों की तारीखों की घोषणा से काफी पहले ही मायावती ने इस सीट से अपने उम्मीदवार का ऐलान कर दिया था. मायावती ने अपने पुराने वफादार और पूर्व विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को प्रत्याशी बना दिया. गुड्डू जमाली, लगातार 2 बार आजमगढ़ की मुबारकपुर सीट से बीएसपी के विधायक रहे हैं. साल 2022 में चुनावों के ठीक पहले जमाली ने एसपी का दामन थाम लिया था. जमाली को उम्मीद थी कि एसपी उन्हें उम्मीदवार बनाएगी, लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें टिकट नहीं दिया. थक हार कर जमाली ने AIMIM के टिकट पर चुनाव लड़ा और 36 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए. जमाली चुनाव हार गए लेकिन माना जाता है कि जमाली के मिले अधिकतर वोट मुस्लिमों के थे. चुनाव खत्म होते ही जमाली ने घर वापसी की और मायावती ने उन्हें आजमगढ़ से प्रत्याशी बनाकर रिटर्न गिफ्ट दे दिया. करीब 3 महीनों से गुड्डू जमाली आजमगढ़ में चुनाव प्रचार कर रहे थे. जमाली का पूरा फोकस मुस्लिम और दलित वोटों पर था. माना जा रहा है कि अब तक एसपी को एक मुश्त जाने वाले मुस्लिम वोटरों के एक बड़े हिस्से ने बीएसपी को भी वोट दिया. जिससे धर्मेंद्र यादव के हार की इबारत लिखी गई. मुस्लिम मतदाताओं ने पिछले विधानसभा चुनावों में एकजुट हो कर एसपी के पक्ष में मतदान किया था, लेकिन सिर्फ तीन महीनों में ही एसपी बदले बीएसपी को तरजीह देने से सारा गणित उल्टा पड़ गया.

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बीएसपी को जिंदा रहने के लिए मुस्लिम महत्वपूर्ण हैं

यूपी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम हैं. मुस्लिमों की ये आबादी करीब 100 सीटों पर हार-जीत का फैसला करती है. इनमें से करीब दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत हासिल कर सकता है. वेस्ट यूपी की कई जिलों में मुस्लिम मतदाता काफी प्रभावी भूमिका रखते हैं. वहीं, यूपी में दलितों की आबादी करीब 21 फीसदी है. अगर मुस्लिम और दलित एक साथ वोट करें, तो ये वोटों का आंकड़ा 40 फीसदी के पार चला जाता है. अगर ये 40 फीसदी वोट सीधे-सीधे बीएसपी को मिलते हैं, तो बीएसपी फिर से कमाल दिखा सकती है. जब-जब मुस्लिमों ने बीएसपी का साथ दिया है. बीएसपी का ग्राफ तेजी से चढ़ा है. मायावती भले ही तीन बार बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं, फिर भी समय-समय पर मुस्लिमों ने बीएसपी पर अपना भरोसा कायम रखा था. हालांकि, इसी साल हुए विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाता ने एसपी के पक्ष में मतदान किया और बीएसपी से पूरी तरह दूर रहा. बीएसपी से मुस्लिमों के दूर होने की एक मात्र वजह ये थी कि मतदाताओं को ऐसा लगा कि बीजेपी को हराने के लिए एसपी के पक्ष में लामबंद होना जरूरी है. वरना मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा बीएसपी के साथ हर चुनाव में रहता है. अब जबकि बीएसपी के पास सिर्फ उसका कोर वोट बैंक (दलित) बचा हुआ है. इसलिए बीएसपी को फिर से खड़ा होने के लिए मुस्लिमों की सख्त जरूरत है. ये बात एक ओपन सीक्रेट की तरह है कि मुस्लिम और दलित वोटों की एकजुटता बीएसपी के गिरते ग्राफ में नई ऊंचाई दे सकती हैं. बीएसपी सुप्रीमो मायावती भी वोटों के इस खेल को समझती हैं, इसलिए उन्होंने एक बार फिर से मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में करने का जतन करना शुरू कर दिया है. अगले कुछ दिनों में बीएसपी नेता जयभीम-जयमीम के नारे को बुलंद करते दिख सकते हैं. हालांकि, बीएसपी के इस प्लान में एसपी रोड़े अटका सकती है. लेकिन उपचुनावों के नतीजों के बाद बीएसपी का उत्साह देखकर ऐसा लगता है कि पार्टी अपनी रणनीति की सफलता के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार है.

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