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Fuel dumping: कभी आपने सुना है कि कई बार पायलट को उड़ते प्लेन से फ्यूल नीचे फेंकना पड़ता है. तो आपको बताते हैं कि कई बार इमरजेंसी फ्लाइट लैंडिंग के वक्त ऐसा क्यों किया जाता है.


Jul 02, 2022 | 7:30 AM

TV9 Hindi

| Edited By: मोहित पारीक

Jul 02, 2022 | 7:30 AM




जब आसमान में प्लेन उड़ता है तो प्लेन को पूरी तरह से पैक कर दिया जाता है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कई बार ऐसी स्थिति आती है कि पायलट को प्लेन में भरा हुआ फ्यूल भी निकालना पड़ता है, इसके लिए हवा में ही फ्यूल को खाली करना पड़ता है. जी हां, हवा में फ्यूल टैंक से पानी निकाल दिया जाता है. आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है और जब फ्यूल निकल जाता है तो वो जमीन पर क्यों नहीं आता.

जब आसमान में प्लेन उड़ता है तो प्लेन को पूरी तरह से पैक कर दिया जाता है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कई बार ऐसी स्थिति आती है कि पायलट को प्लेन में भरा हुआ फ्यूल भी निकालना पड़ता है, इसके लिए हवा में ही फ्यूल को खाली करना पड़ता है. जी हां, हवा में फ्यूल टैंक से पानी निकाल दिया जाता है. आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है और जब फ्यूल निकल जाता है तो वो जमीन पर क्यों नहीं आता.

कब फ्यूल हवा में फेंक देते हैं- कुछ हालात ऐसे होते हैं जब किसी प्लेन के पायलट को हवा में ही विमान का सारा तेल गिरा देना होता है. पायलट यह काम हवा में उड़ते-उड़ते करते हैं. इमरजेंसी में पायलट को ऐसा करना पड़ता है और हालात जब आते हैं, जब फ्लाइट को इमरजेंसी में लैंड करवाना होता है.

कब फ्यूल हवा में फेंक देते हैं- कुछ हालात ऐसे होते हैं जब किसी प्लेन के पायलट को हवा में ही विमान का सारा तेल गिरा देना होता है. पायलट यह काम हवा में उड़ते-उड़ते करते हैं. इमरजेंसी में पायलट को ऐसा करना पड़ता है और हालात जब आते हैं, जब फ्लाइट को इमरजेंसी में लैंड करवाना होता है.

ऐसा क्यों किया जाता है? दरअसल, विमान में तेल का वजन काफी ज्यादा होता है जिसकी वजह से इमरजेंसी लैंडिंग करने पर दिक्कत आ सकती है. इसलिए तेल गिराकर विमान का वजन हल्का किया जाता है. तब जाकर उसकी इमरजेंसी लैंडिंग होती है. इस विधि को फ्यूल जेटिसन कहा जाता है. ऐसा पहले किया भी जा चुका है.

ऐसा क्यों किया जाता है? दरअसल, विमान में तेल का वजन काफी ज्यादा होता है जिसकी वजह से इमरजेंसी लैंडिंग करने पर दिक्कत आ सकती है. इसलिए तेल गिराकर विमान का वजन हल्का किया जाता है. तब जाकर उसकी इमरजेंसी लैंडिंग होती है. इस विधि को फ्यूल जेटिसन कहा जाता है. ऐसा पहले किया भी जा चुका है.

क्या है वैज्ञानिक कारण- प्लेन की डिजाइन इस तरह से बनाई जाती है कि वह एक निश्चित वजन के साथ ही लैंड कर सकता है. विमान का वजन ज्यादा हो तो संभव है कि वह तेजी से धरती पर धक्का मारे और बड़ा नुकसान हो जाए. प्लेन में एक बार में 5 हजार गैलन तेल होता है जो कि तीन हाथी के वजन के बराबर होता है. ऐसे में फुल टैंक के साथ लैंडिंग बहुत बड़े रिस्क का काम है.

क्या है वैज्ञानिक कारण- प्लेन की डिजाइन इस तरह से बनाई जाती है कि वह एक निश्चित वजन के साथ ही लैंड कर सकता है. विमान का वजन ज्यादा हो तो संभव है कि वह तेजी से धरती पर धक्का मारे और बड़ा नुकसान हो जाए. प्लेन में एक बार में 5 हजार गैलन तेल होता है जो कि तीन हाथी के वजन के बराबर होता है. ऐसे में फुल टैंक के साथ लैंडिंग बहुत बड़े रिस्क का काम है.

क्या तेल जमीन पर नहीं गिरता- अब जानते हैं कि जो तेल आसमान में गिराया जाता है, वो जमीन पर गिरता क्यों नहीं है. तो इसका जवाब है कि प्लेन से तेल गिराए जाने के दौरान वह धरती पर पहुंचता ही नहीं है बल्कि हवा में ही धुआं बनकर उड़ जाता है.

क्या तेल जमीन पर नहीं गिरता- अब जानते हैं कि जो तेल आसमान में गिराया जाता है, वो जमीन पर गिरता क्यों नहीं है. तो इसका जवाब है कि प्लेन से तेल गिराए जाने के दौरान वह धरती पर पहुंचता ही नहीं है बल्कि हवा में ही धुआं बनकर उड़ जाता है.






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