Wed. Feb 8th, 2023
कानपुर में मजबूत हैं दावत-ए-इस्लामी की जड़ें, गांवों तक फैला है कट्टरपंथी संगठन का नेटवर्क

कानपुर में मजबूत हैं दावत-ए-इस्लामी की जड़ें (फाइल फोटो)

Image Credit source: टीवी9 भारतवर्ष

उदयपुर की घटना के बाद शहर में एक बार फिर दावत-ए-इस्लामी (Dawat-e-Islami) सुर्खियों में है और उदयपुर की घटना का कानपुर लिंक खंगाला जा रहा है. अभी तक कई नाम भी सामने आए हैं.

उदयपुर में कन्हैयालाल हत्याकांड (Kanhaiyalal Murdercase) के बाद पाकिस्तान का कट्टपंथी मुस्लिम संगठन दावत-ए-इस्लामी (Dawat-e-Islami) फिर चर्चा में है. दावत-ए-इस्लामी के कानपुर में कनेक्शन की जांच एसआईटी करेगी. वहीं बताया जा रहा है कि कानपुर में स्थापित दावत-ए-इस्लामी को इस साल 31 साल पूरे हो रहे हैं और कानपुर (Kanpur) में इसकी जड़ें काफी मजबूत हैं. यही नहीं इसका नेटवर्क गांवों तक फैला है. जानकारी के मुताबिक दावत-ए-इस्लामी के 40 फीसदी से ज्यादा समर्थक गांवों में रहते हैं और इसके समर्थक नुक्कड़ नाटकों के जरिए इस्लाम का प्रचार करते हैं.

दरअसल उदयपुर की घटना के बाद शहर में एक बार फिर दावत-ए-इस्लामी सुर्खियों में है और उदयपुर की घटना का कानपुर लिंक खंगाला जा रहा है. अभी तक कई नाम भी सामने आए हैं और इन्हीं में से एक नाम तलाक महल में रेडीमेड बिजनेस करने वाले व्यक्ति का है और वह दशकों से तंजीम के साथ जुड़ा हुआ बताया जा रहा है. इसके साथ ही दो अन्य नामों का भी खुलासा हुआ है. जो किसी दौर में कानपुर में अहम नाम हुआ करते थे.

कानपुर के चमनगंज से हुई थी दावत-ए-इस्लामी की शुरुआत

जानकारी के मुताबिक कानपुर में 1989 में चमनगंज में दावत-ए-इस्लामी की शुरुआत हुई थी और इसको शुरू करने वाले अब दुनिया में नहीं है. इन लोगों ने 1991 में संस्थापक मौलाना इलियास कादरी को हलीम ग्राउंड में बुलाया था. जानकारी के मुताबिक संगठन में शामिल सदस्यों का समूह एक व्यक्ति के नेतृत्व में निश्चित गांवों में जाता है और वहां सुन्नी मस्जिदों में संपर्क करता है. इसके बाद ये लोग इस्लाम का प्रचार करते हैं. बताया जा रहा है कि दावत-ए-इस्लामी के 40 प्रतिशत से अधिक सदस्य गांव के रहने वाले हैं.

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नुक्कड़ नाटकों के जरिए करते हैं प्रचार

बताया जाता है कि पाकिस्तान के कट्टपंथी दावत-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना इलियास कादरी ने एक पुस्तक फैजान-ए-सुन्नत लिखी है. इसके समर्थक इन किताबों के जरिए ही शहरों और ग्रामीण इलाकों में नुक्कड़ नाटक कर करते हैं और उसमें ये इस्लाम की व्याख्या करते हैं. इसके जरिए ये लोग प्रचार करते हैं.

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