Tue. Feb 7th, 2023
कैप्टन अमरिंदर सिंह बन सकते हैं अगले उपराष्ट्रपति, सिखों और किसानों को साधने की बीजेपी की तैयारी

भाजपा के साथ जल्द अपनी पार्टी का विलय कर सकते हैं कैप्टन अमरिंदर सिंह.

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कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी का बीजेपी में विलय होने के साथ ही उपराष्ट्रपति के लिए उनकी उम्मीदवारी का भी ऐलान किया जा सकता है. अगर इन चर्चाओं में दम है तो माना जाना चाहिए कि बीजेपी एक तीर से कई निशाने साधने की तैयारी कर रही है.

राजनीतिक हलकों में अचानक चर्चा तेज हो गई है कि बीजेपी पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Captain Amarinder Singh) को अगला उपराष्ट्रपति बना सकती है. दरअसल अमरिंदर सिंह ने अपनी पंजाब लोक कांग्रेस पार्टी (Punjab Lok Congress) का बीजेपी में विलय करने का फैसला किया है. उनके इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में एनडीए की तरफ से उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. बताया जा रहा है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी का बीजेपी में विलय होने के साथ ही उपराष्ट्रपति के लिए उनकी उम्मीदवारी का भी ऐलान किया जा सकता है. अगर इन चर्चाओं में दम है तो मना जाना चाहिए कि बीजेपी एक तीर से कई निशाने साधने की तैयारी कर रही है.

देश के मौजूदा उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू का कार्यकाल 11 अगस्त को खत्म हो रहा है. आगामी 6 अगस्त को नए उपराष्ट्रपति का चुनाव होना है. इसके लिए 5 जुलाई को अधिसूचना जारी होगी और 19 जुलाई तक नामांकन भरे जाएंगे. इस लिहाज से देखें तो उपराष्ट्रपति पद के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष की तरफ से जल्द ही उम्मीदवारों के नाम का ऐलान होगा. फिलहाल कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने इलाज के लिए लंदन में है. उनकी सर्जरी हुई है. उनके इसी महीने के दूसरे हफ्ते में स्वदेस वापसी की संभावना है. माना जा रहा है कि वापस आते ही उनकी पार्टी का बीजेपी में विलय की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. उसी दिन या उसके एक दो दिन बाद एनडीए की तरफ से उपराष्ट्रपति पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का ऐलान हो सकता है.

एक तीर से कई निशाने साधने की तैयारी

दरअसल बीजेपी कैप्टन अमरिंदर सिंह के सहारे एक तीर से कई निशाने साधना चाहती है. एक तो यह कि बीजेपी के इस कदम से सिख समुदाय में बेहद सकारात्मक संदेश जाएगा. इससे सिख समुदाय और किसानों में कृषि कानून को लेकर बीजेपी के प्रति उपजी नाराजगी को काफी हद तक कम करने में मदद मिलेगी. दूसरा और सबसे अहम, इससे बीजेपी पंजाब में अपनी पैठ बना सकती है. अभी पंजाब की राजनीति आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच सिमट गई है. लंबे समय तक बीजेपी की सहयोगी रही शिरोमणि अकाली दल पंजाब की रीजनीति में हाशिए पर पहुंच गई है. अगर कैप्टन के सहारे बीजेपी सिख समुदाय में अपनी पैठ बना लेती है तो भविष्य में वो पंजाब में भी अपने बूते सरकार बनाने का सपना साकार कर सकती है.

जब तक शिरोमणि अकाली दल के साथ बीजेपी का राजनीतिक गठबंधन था तब तक बीजेपी ने पंजाब में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की बहुत ज्यादा कोशिश नहीं की. कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल ने जब बीजेपी से नाता तोड़ा तो बीजेपी को एहसास हुआ कि पंजाब के सिख समुदाय में भी उसे स्वतंत्र रूप से अपना नेतृत्व तैयार करना चाहिए. पंजाब में बीजेपी के पास कोई बड़ा सिख चेहरा नहीं है. कैप्टन अमरिंदर सिंह के कांग्रेस छोड़कर अलग पार्टी बनाने के बाद बीजेपी को यह उम्मीद बनी कैप्टन के सहारे वो पंजाब में पैठ बना सकती है. इसी मकसद से बीजेपी ने हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी से गठबंधन किया था. हालांकि गठबंधन से बीजेपी और कैपटन की पार्टी दोनों को ही फायदा नहीं हुआ. लेकिन एक नया सियासी समीकरण जरूर सामने आ गया. चुनाव के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह बीजेपी में अपनी पार्टी का विलय करने को तैयार हुए. बीजेपी को पंजाब में नहीं संभावना दिखने लगीं.

पंजाब में क्या है बीजेपी की स्थिति

पंजाब की मौजूदा विधानसभा में बीजेपी के कुल 2 विधायक हैं. हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उसे 6.6% वोट मिला था. बीजेपी ने 73 सीटों पर चुनाव लड़ कर सिर्फ 2 सीटें जीती थीं और 10 लाख 27 हजार 40 वोट हासिल किए थे. यह चुनाव बीजेपी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था. अमरिंदर सिंह की पार्टी 28 सीटों पर चुनाव लड़कर एक भी सीट जीतने में नाकाम रही थी. पिछली विधानसभा में बीजेपी ने अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. तब गठबंधन में बीजेपी को मात्र 23 सीटें मिली थीं. तब उसके तीन विधायक जीते थे और उसे 5.39% वोट मिला था. वहीं लोकसभा की बात करें तो मौजूदा लोकसभा में बीजेपी के पंजाब से दो लोकसभा के सदस्य हैं. जबकि पिछली लोकसभा में भी बीजेपी की दो ही सीटें जीत पाई थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 2.63% वोट मिले थे जबकि 2014 में उसे 8.7% वोट मिले थे.

अमरिंदर के सहारे पंजाब साधने की कोशिश

बीजपी कैप्टन अमरिंदर के सहारे पंजाब को साधने की कोशिश कर रही है. खासकर सिख समुदाय से नजदीकी बढ़ाने के लिए भाजपा हर दांव खेल रही है. प्रधानमंत्री मोदी सिख शख्सियतों से मिल रहे हैं. वहीं, लाल किले में श्री गुरु तेग बहादुर जी का प्रकाश उत्सव भी मनाया जा चुका है. भले ही कैप्टन अपनी पार्टी बनाकर कामयाब नहीं हुए हों लेकिन वो पंजाब के सियासी दिग्गज हैं. शहरों से लेकर गांवों तक हर जगह वह चर्चित नेता हैं. इसलिए कैप्टन के सहारे 2024 लोकसभा चुनाव से पहले बीजपी पंजाब की 13 सीटों पर नजर लगाए बैठी है. कृषि सुधार कानूनों के विरोध में हुए किसान आंदोलन के चलते सिख भाजपा से नाराज चल रहे हैं. अगर बीजेपी कैप्टन को उपराष्ट्रपति बना देती है तो अगले लोकसभा चुनाव में पंजाब में उसे सिख समुदाय का एकतरफा वोट मिल सकता है. इससे वो लोकसभा में अपनी सीटों की संख्या दे से बढ़ा कर 5-10 तक ले जा सकती है.

हिंदू सिख एकता की दिशा में अहम कदम

कैप्टन अमरिंदर सिंह को उपराष्ट्रपति बनाना बीजेपी और संघ परिवार के वृहद एजेंडे की तरफ एक कदम और आगे बढ़ना होगा. दरअसल संघ परिवार हिंदू धर्म से निकले सभी धर्मों को हिंदू धर्म का ही हिस्सा मानता है. क्योंकि शादी-विवाह से लेकर मरने तक के संस्कारों में हिंदू सिख बौद्ध और जैन धर्म के एक जैसे रस्मो रिवाज हैं. संघ परिवार का मकसद इनसबको को एकजुट करके हिंदुत्व की छतरी के नीचे लाना है. कैप्टन अमरिंदर सिंह को उपराष्ट्रपति बनाकर बीजेपी संघ के इसी एजेंडे पर आगे बढ़ने का संकेत देगी. प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने सिख धर्म के प्रति विशेष लगाव दिखाया है. उनका बार-बार गुरुद्वारों में जाना और सिख गुरुओं की जयंती या उनके बलिदान दिवस पर उन्हें याद करना इसका उदाहरण है. प्रधानमंत्री कई मंच से कह चुके हैं कि सिख गुरुओं ने धार्मिक कट्टरता के खिलाफ मजबूती से आवाज उठाई थी. लिहाजा इस प्रयोग से हिंदू-सिख एकता को मजबूती मिलेगी.

आजादी के बाद देश में सिख समुदाय से ज्ञानी जैल सिंह के रूप में सिर्फ एक राष्ट्रपति बने हैं. जबकि उप राष्ट्रपति पद पर सिख समुदाय से अभी तक कोई नहीं पहुंचा. कांग्रेस ने डॉ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था. वो पूरे 10 साल प्रधानमंत्री रहे. ऐसा करके कांग्रेस ने 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार का अपना पाप धोने की कोशिश की थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और देश के कई हिस्सों में हुए सिखों की नरसंहार की वजह से सिख समुदाय में कांग्रेस के प्रति नाराजगी रही. डॉ. मनममोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर इस नाराजगी को दूर करने की कोशिश की थी. नाराजगी तो दूर नहीं हुई लेकिन इसमें कमी ज़रूर आई थी. इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते 2007 और 2012 में कंग्रेस पंजाब विधानसभा का चुनाव हार गई थी.

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अब बीजेपी की कोशिश है कि सिख समुदाय में कांग्रेस के प्रति बची नाराज़गी का फायदा उठाकर उसे अपने पक्ष में वोटों में तब्दील किया जाए. कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी कांग्रेस से बहुत बेइज्जत करके निकाला गया था. उपराष्ट्रपति के रूप में वो बीजेपी के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकते हैं. इससे बीजेपी एक बार फिर य संदेश देने में कामयाब हो जाएगी कि जिन्हें कांग्रेस में बरसों रहकर वाजिब सम्मान नहीं मिला उन्हें बीजेपी ने वो पद और सम्मान दिया है जिसके वो हकदार थे. ज्योतिरादित्य सिंधिया, हिमंत बिस्व सरमा, जितिन प्रसाद जैसे तमाम नेताओं की फेहरिस्त में कैप्टन के रूप में एक और नाम जुड़ जाएगा. राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान कैप्टन अमरिंदर को सभापति का कुर्सी पर बैठा देख कांग्रेसियों को होने वाली जलन से बीजेपी के मंत्रियों और सासंदों को अपार सुख की अनुभूति होगी.

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