Wed. Feb 8th, 2023
बच्चा पैदा करने में पिछड़ रहे हैं पुरुष! प्रजनन क्षमता में हो रही कमी के पीछे तनाव, धूम्रपान, शराब समेत ये है बड़ी वजहें

पुरुषों में क्‍यों कम हो रही प्रजनन क्षमता?

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सीनियर आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ स्वाति मिश्रा कहतीजो व्यक्ति हर दिन 20 से ज्यादा सिगरेट पीते हैं उनमें गैर धूम्रपान वाले लोगों के मुकाबले 13-17 प्रतिशत कम शुक्राणु संख्या पाई गई थी.

Infertility in men: सभी बांझपन मामलों में पुरुष संबंधित समस्याओं का 50 प्रतिशत योगदान है. बांझपन (Infertility) को अक्सर महिलाओं की समस्या के तौर पर देखा जाता है. और महिलाओं को निःसंतान (बांझ) होने के बोझ का सामना करना पड़ता है. भारत में बांझपन की स्थिति पर WTO के नए आकलन के अनुसार, बांझपन के सभी मामलों में करीब आधे से ज्यादा पुरुषों से जुड़े होते हैं, जिन्हें पुरुषों की प्रजनन क्षमता में कमी के कारण बढ़ावा मिलता है. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के चिकित्सकों के अनुसार, हर साल भारत में करीब 1.2-1.0 करोड़ दंपती बांझपन की जांच कराते हैं. उन्होंने पाया कि जहां सामान्य भारतीय युवा के शुक्राणु की गणना तीन दशक पहले 6 करोड़ प्रति एमएल की जाती थी, वहीं अब मौजूदा समय में यह करीब 2 करोड़ रह गई है.

बांझपन के जोखिम उम्र के साथ भी बढ़ते हैं जैसा कि महिलाओं में देखा जाता है. सीनियर आईवीएफ स्पेशलिस्ट (Crysta IVF) डॉ स्वाति मिश्रा कहती हैं कि पुरुष प्रजनन क्षमता में गिरावट के लिए कई कारणों को जिम्मेदार माना जा सकता है. पुरुषों की बांझपन दर भी खराब जीवनशैली, शारीरिक गतिविधि के अभाव, अधिक दबावपूर्ण कार्यशैली, प्रदूषण, खराब आहार, शराब के इस्तेमाल और धूम्रपान की वजह से भी बढ़ी है. तंबाकू इस्तेमाल का भी घटते शुक्राणुओं से संबंध है और इसका शुक्राणु पैदा करने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है. धूम्रपान, शराब पीना और खराब जीवनशैली का पुरुष के शुक्राणु पैरामीटरों पर नकारात्मक असर पड़ता है.

पुरुषों में बांझपन के इन प्रमुख कारणों की भी जानकारी होनी चाहिए.

  1. तंबाकू इस्तेमालःसिगरेट पीने से आपके शरीर में 7,000 से ज्यादा केमिकल एंड रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पेसीज ( ROS) पहुंचते हैं, जो शुक्राणु क्षमता को प्रभावित करते हैं, शुक्राणु की संख्या में कमी आती है, और आखिरकार पुरुष बांझपन को बढ़ावा मिलता है. धूम्रपान न सिर्फ शुक्राणु की संख्या में कमी लाता है बल्कि इससे शुक्राणुओं की गुणवत्ता भी घटती है. इसके अलावा धूम्रपान और स्पर्म कंसनट्रेशन के बीच डोज-डिपेंडेंट कनेक्शन रहा है. जो व्यक्ति हर दिन 20 से ज्यादा सिगरेट पीते हैं उनमें गैर धूम्रपान वाले लोगों के मुकाबले 13-17 प्रतिशत कम शुक्राणु संख्या पाई गई थी. पैटरनल स्मोकिंग भी विट्रो फर्टिलाइजेशन ( IVF) और इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (ICSI) विफलता के लिए मुख्य जोखिम कारक है, जिससे एसिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) के लिए कम सफलता दर देखी जा सकती है.
  2. शराब का सेवनः कई अध्ययनों में शराब के सेवन और शुक्राणुओं की संख्या में कमी के बीच संबंध देखा गया है. इसके अलावा अधिक शराब पीने से न सिर्फ शुक्राणुआों की गतिशीलता में कमी आती है बल्कि इसका मोरफोलाॅजी (आकार और ढांचे) पर भी प्रभाव पड़ता है. ज्यादा शराब पीने से शुक्राणुओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है और पुरुष प्रजनन हार्मोन का स्तर भी घट जाता है. शराब पीने से हार्मोन उत्पादन बाधित होता है, जिसमें टेस्टोटेरोन (पुरुष सेक्स हार्मोन) के साथ-साथ लीडिग और सेरटोली सेल्स का कार्य भी प्रभावित होता है.
  3. अस्वस्थ भोजनः जंक फूड, प्रोसेस्ड फूड, फ्रायड फूड, और अधिक चीनी या नमक वाले भोजन से मोटापे, मधुमेह, दिल की बीमारी और अन्य जटिल परिस्थितियों को बढ़ावा मिल सकता है. इन सब सस्याओं से बांझपन का जोखिम बढ़ता है. एक नए अध्ययन से पता चला है कि जो लोग प्रोसेस्ड मीट खाते हैं, उनमें कम मीट खाने वालों की तुलना में सामान्य आकार के स्पर्म सेल्स कम संख्या में होते हैं. लंबी अवधि में स्वस्थ भोजन और संतुलित आहार आपके प्रजनन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है.
  4. खतरनाक पदार्थ और रेडिएशन से खतराः हाल के शोध से पता चला है कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन और पेस्टीसाइड जैसे खतरनाक उत्पादों के बार बार संपर्क में रहने से शुक्राणुओं की संख्या, मोरफोलाॅजी और मोटिलिटी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. अब सब्जियों पर कीटनाशकों और रसायनों का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ गया है, इसलिए इनका हमारे मानव शरीर पर खतरनाक असर पड़ रहा है. इसके अलावा बढ़ते इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन को नियंत्रित करना भी बड़ी चुनौती है क्योंकि यह अब सेल फोन, लैपटॉप और माइक्रोवेव जैसे रोजाना इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के जरिये फैल रहा है.
  5. मादक पदार्थ का इस्तेमालः यह जरूरी है कि हम स्टेरॉयड, पेनकिलर, भांग, गांजा जैसे ड्रग से दूर रहें. स्टेरॉयड का इस्तेमाल कुछ लोग बॉडी बनाने और अपने फिटनेस रुटीन या एथलेटिक क्षमताओं में सुधार लाने के लिए करते हैं, जिससे हार्मोनल प्रक्रिया में बदलाव आता है और शुक्राणुओं का उत्पादन नियंत्रित होता है. नशीले पदार्थ शुक्राणुओं के उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं और इनकी गुणवत्ता में कमी ला सकते हैं. कई अध्ययनों में पाया गया है कि भांग या गांजे के नियमित इस्तेमाल से भी शुक्राणुओं की संख्या घट सकती है.
  6. तनावः तनाव का भावनात्मक एवं शारीरिक प्रभाव पड़ता है, वहीं साथ ही इसका यौन प्रभाव भी हो सकता है. तनाव से कोकोर्टिकोइड्स या स्टेराॅयड हार्मोन पैदा होने में तेजी आती है जिससे कार्बोहाइड्रेड, फैट और प्रोटीन मेटाबोलिज्म की प्रक्रिया प्रभावित होती है, टेस्टोटेरोन लेवल और शुक्राणु उत्पादन में कमी आती है. इसके अलावा, तनाव से रेडिकल नुकसान के जरिये ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस या शरीर पर साइलॉजिकल स्ट्रेस को बढ़ावा मिलता है, जिसका शुक्राणु की गुणवत्ता और बांझपन से संबंध है.
  7. सुस्त जीवनशैलीः कम शारीरिक गतिविधि वाली सुस्त जीवनशैली का शुक्राणु की गुणवत्ता और मात्रा के साथ साथ प्रतिरोधक क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. कुल मिलाकर, इससे प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है.

तो फिर उपाय क्या है?

डॉ स्वाति बताती हैं, “बांझपन से बचने के लिए प्रदूषण से दूरी बनानी होगी, शराब का सेवन और धूम्रपान कम करना होगा. मिलावटी भोजन से परहेज करना, केमिकल वाले फूड से बचना और साथ ही ऐसे कार्यों से बचना जो अंडकोष को ज्यादा गर्मी प्रदान करते हों जिससे कि कम शुक्राणु की समस्या न हो.”

हालांकि पुरुष बांझपन के इन सभी कारणों से परहेज नहीं किया जा सकता है. लेकिन ऐसे मामलों में, एसिस्टेड रीप्रोडक्शन ट्रीटमेंट (ART) जैसे इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (ICSI) और इंट्रासाइटोप्लास्मिक मोरफोलाॅजिकली-सलेक्टेड स्पर्म इंजेक्शन (IMSI) उपलब्ध है, जिनसे कम शुक्राणु की समस्या से जूझ रहे या संतान सुख की चाहत रखने वाले पुरुषों को मदद मिल सकती है.

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