Wed. Feb 8th, 2023
बड़े दिलवाले देवेंद्र फडणवीस! कैसे किंग से किंगमेकर की भूमिका में उभरे? पढ़िए सियासत का पूरा सफरनामा

देवेंद्र फडणवीस (File Photo)

ऐसा पहली बार नहीं है कि देवेंद्र फडणवीस ने पहली बार बड़ा दिल दिखाया है. 2019 विधानसभा चुनाव में जब साथ लड़ने के बावजूद शिवसेना अलग हो गई तब भी फडणवीस, अजीत पवार के साथ सीएम की कुर्सी बांटने को तैयार हो गए थे.

महाराष्ट्र की सियासत में 30 जून की तारीख एक नए सूर्य के उदय के रूप में दर्ज हो गई है. एनसीपी और कांग्रेस के साथ शिवसेना की बेमेल जोड़ी वाली सरकार गिरने के बाद अब एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) नए मुख्यमंत्री बन गए हैं. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने एक बार फिर बड़ा दिल दिखाया है. उन्होंने शिवसेना के बागी विधायकों के साथ हिंदुत्व के मुद्दे पर साथ आए एकनाथ शिंदे को सीएम की कुर्सी सौंप दी है और खुद डिप्टी सीएम बनना स्वीकार किया है. उनके इस फैसले की सराहना हो रही है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी फडणवीस की प्रशंसा की है.

जेपी नड्डा ने कहा कि देवेंद्र फडणवीस ने बड़ा दिल दिखाया है. यह फैसला पार्टी के नेता, कार्यकर्ता के चरित्र को दिखाता है कि हमें किसी पद का लालच नहीं है. हमारे लिए विचार सबसे पहले हैं. बीजपी सिर्फ महाराष्ट्र की जनता की भलाई चाहती है. यह पहला मौका नहीं है, जब फडणवीस का यह रूप दिखा है.

किंग से किंगमेकर वाली भूमिका

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में देवेंद्र फडणवीस को ऐसे नेता के तौर पर जाना जाता है, जो चुपचाप बड़े उलट-फेर करने के लिए जाने जाते हैं. महाराष्ट्र में पिछले कुछ समय से चला सियासी ड्रामा हो या फिर 2019 विधानसभा चुनाव के बाद एनसीपी में सेंधमारी कर सरकार बनाने की रणनीति तैयार करना… बीजेपी में रहते हुए वे ऐसे सियासी दांव-पेच में माहिर होते जा रहे हैं.

एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने जाने की घोषणा के साथ ही उन्होंने खुद को बड़े दिलवाला साबित कर दिया. पहले तो उन्होंने कुर्सी का मोह त्यागते हुए बाहर से ही सरकार को समर्थन देने की घोषणा कर दी थी. हालांकि बीजेपी शीर्ष नेतृत्व के अनुरोध के बाद उन्होंने डिप्टी सीएम की​ जिम्मेदारी स्वीकार की. भले ही बीजेपी जोड़तोड़ की राजनीति से इनकार करती रही, लेकिन जिस तरह पिछले दिनों उद्धव सरकार गिराने की पटकथा लिखी जा रही थी, उसमें कहीं न कहीं फडणवीस की भी भूमिका रही होगी.

इस दौरान वे दिल्ली का दौरा करते रहे, केंद्रीय नेतृत्व को महाराष्ट्र की राजनीतिक उथल-पुथल से रूबरू कराते रहे. कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री रह चुके देवेंद्र फडणवीस इस बार एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर किंग से किंगमेकर वाली भूमिका में आगे बढ़े हैं.

अजीत पवार के लिए भी दिखाया था बड़ा दिल!

ऐसा पहली बार नहीं है कि देवेंद्र फडणवीस ने पहली बार बड़ा दिल दिखाया है. 2019 विधानसभा चुनाव में जब साथ लड़ने के बावजूद शिवसेना अलग हो गई तब भी फडणवीस, अजीत पवार के साथ सीएम की कुर्सी बांटने को तैयार हो गए थे. तब उन्होंने एनसीपी प्रमुख शरद पवार के घर में ही सेंधमारी कर दी थी और रातों-रात अजीत पवार को अपने खेमे में शामिल कर लिया था. तब भी वे दिल्ली जाकर अजीत पवार संग सरकार बनाने के लिए अनुमति लेकर आए थे.

तब शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी में सरकार गठन को लेकर बातचीत के दौरान विभागों के बंटवारे में बात नहीं बनी थी. अजीत पवार बातचीत से असंतुष्ट थे. ऐसे में बीजेपी से जब उन्हें ऑफर मिला तो वे ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद की मांग कर दी. तब फडणवीस बड़ा दिल दिखाते हुए इसके लिए राजी हो गए थे. हालांकि दुर्योगवश वे सफल नहीं हो पाए. अजीत पवार को महाविकास अघाड़ी सरकार में डिप्टी सीएम का पद मिल गया और वे फिर उधर हो गए.

आरएसएस की शाखा से शुरू हुआ सफर

नागपुर में जन्मे देवेंद्र फडणवीस आज जिस शिखर पर हैं, वहां तक पहुंचना आसान नहीं था. उनके पिता गंगाधर राव फडणवीस नागपुर से ही एमएलसी थे. आरएसएस की शाखा से फडणवीस का सफर शुरू हुआ था. 1989 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े थे. फिर वे भाजपा युवा मोर्चा के वार्ड अध्यक्ष बने और फिर 1992 में उन्होंने पहली बार निकाय चुनाव लड़ा. जीते भी. 1994 में उन्हें भाजपा युवा मोर्चा, महाराष्ट्र स्टेट का उपाध्यक्ष बना दिया गया. उसी साल उन्हें नागपुर नगर निगम का सबसे युवा पार्षद चुना गया. तब उनकी आयु मात्र 22 वर्ष थी. 1997 में ही वह नागपुर के सबसे युवा मेयर चुने गए, तब उनकी उम्र महज 27 वर्ष थी. और फिर वर्ष 2001 में उन्हें भाजयुमो का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया.

ऐसे बड़ा होता गया कद और पद

2009 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को राज्य में मात्र 46 विधानसभा सीटें मिली थीं, लेकिन 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शिवसेना के गठबंधन तोड़ने के बावजूद बीजेपी ने 122 सीटों पर जीत दर्ज की. बतौर प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस की इस कामयाबी की प्रशंसा हुई. देवेंद्र फडणवीस 1999, 2004 और 2009 में, तीन बार विधानसभा चुनाव जीत चुके थे, लेकिन उन्हें मंत्री पद भी नहीं मिला था. 2014 में बड़ी जीत के बाद वे मुख्यमंत्री बने और इसके बाद उनका कद बड़ा होता चला गया.

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