Tue. Feb 7th, 2023
महाराष्ट्र संकट में राज्यपाल ने संविधान का पालन किया, बोले विशेषज्ञ

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (फाइल फोटो)

एक बार जब राज्यपाल यह राय बना लेता है कि राज्य सरकार के पास बहुमत नहीं है, तो यह उसका कर्तव्य है कि वह मुख्यमंत्री को सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहे.

उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की अगुवाई वाली महा विकास आघाड़ी (MVA) सरकार का पतन का कारण एकनाथ शिंदे (Eknath shinde) और उनके साथियों की कुशल योजना है. शिंदे को बीजेपी का भी समर्थन था. शिंदे और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अच्छे संबंध हैं.

फडणवीस ने गुरुवार को घोषणा की कि शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री होंगे. माना जा रहा था कि महाराष्ट्र के पूर्व सीएम फडणवीस सीएम बनेंगे, लेकिन उन्होंने कहा कि वह कैबिनेट का हिस्सा नहीं होंगे. लेकिन बाद में वह डिप्टी सीएम बने.

विधानसभा में फ्लोर टेस्ट से पहले ही उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. राज्यपाल ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया.

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने 29 जून को देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की थी, जिसके बाद कोश्यारी ने उद्धव को गुरुवार को सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहा. कोश्यारी उत्तराखंड के पूर्व सीएम हैं. महाराष्ट्र में एमवीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में उनकी भूमिका सवालों के घेरे में रही है.

राज्यपाल की भूमिका को गहराई से समझने के लिए टीवी 9 ने लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचार्य से बातचीत की. पेश हैं इसके प्रमुख अंश –

जब भी किसी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है, तो राज्यपाल की भूमिका अहम हो जाती है. उनकी कौन-सी शक्तियां होती हैं?

राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है. राज्यपाल के पास कोई कार्यकारी शक्ति नहीं होती. हालांकि, जब कोई राजनीतिक संकट होता है यानी जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने सदन में बहुमत खो दिया हो तो राज्यपाल का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार चले.

एक बार जब राज्यपाल यह राय बना लेता है कि राज्य सरकार के पास बहुमत नहीं है, तो यह उसका कर्तव्य है कि वह मुख्यमंत्री को सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहे. यदि सरकार बहुमत खो देती है, तो राज्यपाल दूसरी सरकार की संभावनाएं तलाश करे. वह विपक्षी नेता से पूछ सकता है कि क्या वह सरकार बना सकते हैं.

क्या राज्यपाल कोश्यारी ने संविधान के अनुसार काम किया?

इस स्थिति में उन्होंने जो किया उसमें मुझे कोई गलती नजर नहीं आती. क्योंकि मुख्यमंत्री ने बहुमत खो दिया था. तमाम तरह की समस्याओं से ऐसा माहौल खड़ा हुआ कि उद्धव के नेतृत्व वाली सरकार बहुमत खो चुकी है. राज्यपाल को बाहरी सूचना के स्रोत पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं है.

सरकार के बहुमत पर राज्यपाल को राय बनाने की संवैधानिक रूप से अनुमति है. उन्हें केवल यही पूछना होता है कि पार्टी की स्थिति क्या है. आम तौर पर जो सरकार अपना बहुमत खो देती है, उसे सत्ता में रहने की अनुमति नहीं होती. उसे सरकार छोड़नी ही होगी और नई सरकार बनेगी. इसलिए महाराष्ट्र में उन्होंने जो कुछ भी किया वह संविधान के दायरे में था.

राज्यपाल का आदेश फडणवीस से मुलाकात के बाद आया. कई लोगों का दावा है कि उन्होंने फडणवीस की सलाह पर फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था?

यह धारणा सही हो सकती है. लेकिन यह कोई जरूरी बात नहीं है. देर-सबेर राज्यपाल ने अपनी राय बना ली होगी और सरकार से बहुमत साबित करने को कहा होगा. कोई यह नहीं कह सकता कि राज्यपाल ने फडणवीस से मिलने से पहले कोई राय नहीं बनाई होगी. राज्यपाल, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. स्वाभाविक रूप से, वे ऐसी स्थितियों पर अलग तरह से काम करेंगे.

राज्यपाल पद के राजनीतिकरण के बारे में आप क्या कहेंगे?

राज्यपाल का पद शुरू से ही विवादास्पद रहा है क्योंकि उन्हें राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त किया जाता है. केंद्र सरकारें, असंतुष्ट नेताओं या ऐसे नेताओं जो सरकार के लिए सिरदर्द बन चुके हैं, उन्हें राज्यपाल बनाती रही हैं. केंद्र के इशारे पर राज्यपाल, राज्य सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करने के लिए हर तरह की राजनीति कर सकते हैं. इसमें कोई नई बात नहीं है, यह लंबे समय से होता रहा है.

क्या भारत में राज्यपाल का पद खत्म किया जा सकता है?

राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक कड़ी होता है. हमारे देश में संघीय व्यवस्था है, जो अमेरिका से बहुत अलग है. यहां, राज्य सरकारों के विपरीत केंद्र सरकार बहुत शक्तिशाली होती है. ऐसे में एक लिंक होना जरूरी है. राज्य सरकारें को भी कुछ तय शक्तियां मिलती हैं, लेकिन केंद्र सरकार अधिक शक्तिशाली होती है.

संविधान के अनुच्छेद 355 के तहत केंद्र सरकार को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति के खिलाफ राज्यों की रक्षा करनी होती है. यह भी देखना होता कि राज्य सरकारें संविधान के मुताबिक चल रही हैं या नहीं. राज्यपाल को यह सुनिश्चित करना चाहिए.

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भारत अभी इस पद को खत्म नहीं कर सकता. हालांकि, केंद्र सरकार एक गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को राज्यपाल बना सकती है. उदाहरण के लिए एपीजे अब्दुल कलाम को ही ले लें, वे हमारे राष्ट्रपति थे लेकिन राजनेता नहीं थे. रिटायर शिक्षाविद, राजनीतिक पृष्ठभूमि के राज्यपालों की जगह ले सकते हैं.

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