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Azadi Ka Amrit Mahotsav : सरदार उधम सिंह ने लंदन जाकर लिया था जालियांवाला बाग का बदला, भगत सिंह को मानते थे आदर्श

वीर क्रांतिकारी सरदार उधम सिंह

जालियांवाला बाग में जो हुआ, उससे पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा चरम पर था, खासकर पंजाब के नौजवानों ने इस निर्मम हत्याकांड का बदला लेने का प्रण लिया था. इन्हीं में से एक नौजवान सरदार उधम सिंह भी थे.

13 अप्रैल 1919 को जालियांवाला बाग में जो हुआ, उससे पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा चरम पर था, खासकर पंजाब के नौजवानों ने इस निर्मम हत्याकांड का बदला लेने का प्रण लिया था. इन्हीं में से एक नौजवान सरदार उधम सिंह भी थे जो इस घटना से इतने आक्रोशित थे कि उन्होंने जालियां वाला बाग की मिट्टी हाथों में लेकर गोली चलाने का आदेश देने वाले कर्नल रेजीनाल्ड डायर और पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल फ्रेंसिस ओ डायर को मारने की शपथ ली थी. पूरे 21 साल तक प्रयास करने के बाद 1940 में माइकल ओ डायर को मारकर वह अपना बदला पूरा कर सके थे. तब तक कर्नल रेजीनाल्ड डायर की मौत हो चुकी थी. घटना को अंजाम देने के बाद उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की और खुद को गिरफ्तार करा लिया.

पंजाब के सुनाम में हुआ था जन्म

सरदार ऊधम सिंह का जन्म 28 दिसंबर 1899 को पंजाब के जिले संगरूर के गांव सुनाम में हुआ था, उनके पिता का नाम तहल सिंह और माता नारायण कौर थीं. जिन्होंने इनका नाम शेर सिंह रखा था. जन्म के दो साल बाद ही उनकी माता का निधन हो गया था. कुछ ही वर्ष बाद 1907 में उनके पिता की भी मौत हो गई. इसके बाद ये भाई के साथ एक अनाथालय में रहे जहां इन्हें उधम सिंह नाम मिला.

1919 में छोड़ दिया अनाथालय

सरदार उधम सिंह के भाई का 1917 में निधन हो गया था. इसके बाद 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया, इसी दौरान जालियांवाला बाग हत्याकांड हुआ और उन्होंने इसके दोषियों को मारने का संकल्प लिया. इसके लिए वे एक मजदूर के रूप में ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए और विदेश यात्रा की.

कई देशों में गए- कई नाम बदले

विदेश यात्राओं के दौरान सरदार उधम सिंह कई देशों में गए और कई नाम भी बदले, उन्होंने फ्रैंक ब्राजील, उदय सिंह, उधन सिंह और मोहम्मद सिंह आजाद नाम रखा. 1920 के दशक की शुरुआत में उधम सिंह गदर आंदोलन में शामिल हो गए. वह लंदन स्थित वर्कर्स एसोसिएशन से भी जुड़े, 1927 में वे फिर भारत लौट आए और प्रतिबंधित साहित्य के साथ हथियारों की तस्करी भी की. इसी साल 30 अगस्त को उन्हें गिरफ्तार कर पांच साल कैद की सजा सुनाई गई.

1934 में दोबारा पहुंचे इंग्लैंड

जेल में अच्छे बर्ताव की वजह से सरदार उधम सिंह की सजा एक साल कम कर दी गई, चार साल की सजा काटकर 23 अक्टूबर 1931 को उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन वे पुलिस की रडार पर रहे. हालांकि वे छिपते-छिपाते क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते रहे. इसी बीच मौका पाकर वे 1933 में जर्मनी गए और वहां से फिर लंदन पहुंच गए और धैर्य के साथ उस मौके की तलाश करने लगे जिसका उन्हें वर्षों से इंतजार था. लंदन में उन्होंने इंडियन वर्कर्स एसोसिएशन ज्वाइन की.

छह साल बाद मिला मौका

1934 में इंग्लैंड पहुंचने के बाद सरदार उधम सिंह लगातार सही मौके का इंतजार करते रहे. 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल उन्हें अपना बदला लेने का अवसर मिला. यहां रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी के साथ मिलकर ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की बैठक चल रही थी. सरदार उधम सिंह अपनी डायरी में रिवॉल्वर छिपा कर ले गए.

ले लिया जालियांवाला हत्याकांड का बदला

बैठक में उन्होंने माइकल ओ डायर पर पांच गोलियां चला दीं, इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई, डायर उस समय पंजाब का तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर था जब जालियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था. जालियांवाला बाग में हत्याकांड का आदेश देने वाले रेजीनाल्ड डायर की 1927 में ही मौत हो गई थी. इस तरह उधम सिंह का संकल्प पूरा हो गया.

लंदन में ही दी गई फांसी

सरदार उधम सिंह पर माइकल ओ डायर को मारने का मुकदमा चला, जेल में बंद रहने के दौरान उन्होंने भूख हड़ताल भी की. सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. अदालत में एक और अपील दायर की गई, जिसे खारिज कर दिया गया. 31 जुलाई 1940 को भारत माता का वीर सपूत उधम सिंह लंदन की जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया.

35 साल बाद वतन वापस लाए गए अस्थि अवशेष

फांसी के बाद सरदार उधम सिंह के पार्थिव शरीर को जेल में दफना दिया गया था. 1974 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह अपने प्रयासों से उधम सिंह के अस्थि अवशेषों को भारत वापस लाए. भारत में एक शहीद के तौर पर उनके अस्थि अवशेषों का स्वागत किया गया था. 2 अगस्त 1974 को उनका अंतिम संस्कार किया गया और कई अस्थि कलश बनाए गए. एक कलश गंगा में विसर्जित किया गया तो एक कलश को शहीद की यादगार के तौर पर जालियांवाला बाग स्मारक में रखा गया है, बाकी तीन कलश हिंदू, मुस्लिम और सिख के पवित्र स्थानों पर दफना दिए गए.

पर्स में रखते थे भगत सिंह की तस्वीर

सरदार उधम सिंह आजादी के दीवाने थे, उम्र में छोटे होने के बावजूद उन पर सबसे ज्यादा प्रभाव भगत सिंह का था, यही कारण था कि वह हर बार अपने पर्स में भगत सिंह की तस्वीर रखा करते थे. हाल ही में उन पर एक फिल्म भी बनाई गई थी, जिसमें सरदार उधम सिंह का किरदार विक्की कौशल ने निभाया था.

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