Mon. Jan 30th, 2023

What is Jelly Ear: यूरोप की अलग-अलग लोकेशंस पर लगे पेड़ों में कान जैसी संरचनाएं लटक रही हैं. इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है. जानिए क्या है इनका सच…


Jul 02, 2022 | 4:40 PM

TV9 Hindi

| Edited By: अंकित गुप्ता

Jul 02, 2022 | 4:40 PM




यूरोप (Europe) की अलग-अलग लोकेशंस पर लगे पेड़ों में कान (Ear on tree) जैसी संरचनाएं लटक रही हैं. इन तस्‍वीरों को सोशल मीडिया (Social Media) पर शेयर करते हुए यूजर्स अपनी-अपनी राय रख रहे हैं. कुछ यूजर्स का कहना है, ऐसा होता ही नहीं हैं और तस्‍वीरों से छेड़छाड़ करके इसे तैयार किया गया है. वहीं, कुछ यूजर्स का कहना है, किसी ने ऐसी तस्‍वीर क्लिक करके मजाक किया है. इस पर विज्ञान कहता है कि हां, इन तस्‍वीरों में सच्‍चाई है. पेड़ों पर कान जैसी संरचना का लटकना सच है. जानिए, ऐसा क्‍यों और कैसे हुआ…

यूरोप (Europe) की अलग-अलग लोकेशंस पर लगे पेड़ों में कान (Ear on tree) जैसी संरचनाएं लटक रही हैं. इन तस्‍वीरों को सोशल मीडिया (Social Media) पर शेयर करते हुए यूजर्स अपनी-अपनी राय रख रहे हैं. कुछ यूजर्स का कहना है, ऐसा होता ही नहीं हैं और तस्‍वीरों से छेड़छाड़ करके इसे तैयार किया गया है. वहीं, कुछ यूजर्स का कहना है, किसी ने ऐसी तस्‍वीर क्लिक करके मजाक किया है. इस पर विज्ञान कहता है कि हां, इन तस्‍वीरों में सच्‍चाई है. पेड़ों पर कान जैसी संरचना का लटकना सच है. जानिए, ऐसा क्‍यों और कैसे हुआ…

ये तस्‍वीरें सच्‍ची हैं. साइंस अलर्ट के ट्वीट के मुताबिक, यूरोप में ऐसी संरचनाएं देखी गई हैं. ये दरअसल एक फंगस होता है, जिसे आम भाषा में जेली ईयर (Jelly Ear) कहते हैं. यह पेड़ों की लकड़ी से जुड़कर बढ़ना शुरू होता है. जैसे-जैसे यह बढ़ता है, इसकी बनावट इंसानी कान की तरह तब्‍दील हो जाती है. नतीजा, थोड़ी दूर से देखने पर लगता है मानों इंसान का कान पेड़ों पर चिपका दिया गया है.

ये तस्‍वीरें सच्‍ची हैं. साइंस अलर्ट के ट्वीट के मुताबिक, यूरोप में ऐसी संरचनाएं देखी गई हैं. ये दरअसल एक फंगस होता है, जिसे आम भाषा में जेली ईयर (Jelly Ear) कहते हैं. यह पेड़ों की लकड़ी से जुड़कर बढ़ना शुरू होता है. जैसे-जैसे यह बढ़ता है, इसकी बनावट इंसानी कान की तरह तब्‍दील हो जाती है. नतीजा, थोड़ी दूर से देखने पर लगता है मानों इंसान का कान पेड़ों पर चिपका दिया गया है.

इस फंगस का वैज्ञानिक नाम ऑरिक्यूलेरिया ऑरिकुला-जुडे (Auricularia auricula-judae) है. जो पूरे यूरोप में पेड़ों की छाल पर उगता है. यूरोप के कई बॉटनिकल गॉर्डन में खासतौर पर लोग इसे देखने पहुंचते हैं. चौंकाने वाली बात है कि यह कोई नई तरह का फंगस नहीं है. 19वीं सदी से इसका इस्‍तेमाल दवा के तौर पर किया जाता रहा है.

इस फंगस का वैज्ञानिक नाम ऑरिक्यूलेरिया ऑरिकुला-जुडे (Auricularia auricula-judae) है. जो पूरे यूरोप में पेड़ों की छाल पर उगता है. यूरोप के कई बॉटनिकल गॉर्डन में खासतौर पर लोग इसे देखने पहुंचते हैं. चौंकाने वाली बात है कि यह कोई नई तरह का फंगस नहीं है. 19वीं सदी से इसका इस्‍तेमाल दवा के तौर पर किया जाता रहा है.

जेली ईयर का इस्‍तेमाल आंख में दर्द, गले में खराश और पीलिया होने पर किया जा जाता था. रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी शुरुआत तो चीन और पूर्वी एशिया से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह यूरोप तक पहुंच गया. इसके औषधीय महत्‍व के कारण चीन में तो बकायदा इसकी खेती भी की जाती थी. वहीं, इंडोनेशिया में इसकी शुरुआत 1930 में हुई थी.

जेली ईयर का इस्‍तेमाल आंख में दर्द, गले में खराश और पीलिया होने पर किया जा जाता था. रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी शुरुआत तो चीन और पूर्वी एशिया से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह यूरोप तक पहुंच गया. इसके औषधीय महत्‍व के कारण चीन में तो बकायदा इसकी खेती भी की जाती थी. वहीं, इंडोनेशिया में इसकी शुरुआत 1930 में हुई थी.

चौंकाने वाली बात यह भी है कि मौसम में बदलाव होने पर यह फंगस अपने अंदर भी उसी तरह से बदलाव करता है. सभी ईयर जेल एक रंग के नहीं होते. ये लाल, भूरे और बैंगनी रंग के हो सकते हैं. सबसे ज्‍यादा ये फंगस गूलर के पेड़ों पर उगते हैं.

चौंकाने वाली बात यह भी है कि मौसम में बदलाव होने पर यह फंगस अपने अंदर भी उसी तरह से बदलाव करता है. सभी ईयर जेल एक रंग के नहीं होते. ये लाल, भूरे और बैंगनी रंग के हो सकते हैं. सबसे ज्‍यादा ये फंगस गूलर के पेड़ों पर उगते हैं.






Most Read Stories


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *