Wed. Feb 8th, 2023
Madhya Pradesh Civic Election: निकाय चुनाव में AAP-AIMIM की एंट्री, क्या तीसरे दल का है कोई विकल्प?

मध्य प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनाव में AAP-AIMIM की एंट्री हो गई है.

Image Credit source: टीवी9

निकाय चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता तीसरे राजनैतिक विकल्प के बारे में क्या सोचती है. बता दें कि राज्य की राजनीति हमेशा 2 पार्टियों के बीच बंटी हुई रही है.

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के निकाय चुनाव रोचक होते जा रहे हैं. बीजेपी और कांग्रेस की टक्कर काफी जोरदार है. खासकर 16 नगर निगमों में लड़ाई सबसे ज़्यादा है, जहां दोनों दलों ने महापौर प्रत्याशियों को दमखम से उतारा है. सभी जगह पार्षद प्रत्याशियों ने भी जीत के लिए पूरा दमखम लगा दिया है. इस बार चुनाव में रोचकता इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि इन चुनावों में 2 प्रमुख स्थानीय दल (जो राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम बना चुके हैं) अब मध्य प्रदेश में घुसपैठ की फिराक में हैं. एआईएमआईएम और आम आदमी पार्टी, दोनों ही दलों का पूर्व में मध्य प्रदेश से कोई खास लगाव नहीं था. लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों के माध्यम से दोनों दलों ने मध्य प्रदेश की राजनीति में घुसपैठ का इरादा जता दिया है.

आम आदमी पार्टी ने 16 नगरीय निकायों में से 14 पर महापौर प्रत्याशी उतारे हैं. वहीं पूरे प्रदेश में 2000 से ज़्यादा पार्षद प्रत्याशी चुनाव में ताल ठोक रहे हैं. आम आदमी पार्टी चुनाव की तैयारी भी काफी तेज़ी से कर रही है. पार्टी प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 2 जुलाई को सिंगरौली आ रहे हैं. यहां पर वह AAP की महापौर प्रत्याशी रानी अग्रवाल के पक्ष में चुनाव-प्रचार करेंगे. वहीं पार्टी विधायक अतिशी शुक्रवार को भोपाल पहुंच रही हैं. पार्टी के अन्य प्रमुख नेता भी जल्द ही मध्य प्रदेश में नजर आएंगे.

मध्य प्रदेश की राजनीति में AAP-AIMIM की एंट्री

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवेसी हाल ही में मध्य प्रदेश दौरे पर पहुंचे थे. यहां उन्होंने अपनी पार्टी के पक्ष में प्रचार भी किया था. उन्होंने कहा कि वह सत्ता के लिए नहीं बल्कि मुसलमानों की लीडरशिप मज़बूत हो इसके लिए आए हैं. असदुद्दीन ने कहा था कि भोपाल, इंदौर, जबलपुर, खंडवा, खरगौन, बुरहानपुर औऱ रतलाम में उनकी पार्टी स्थानीय चुनाव लड़ रही है. इसमें से सिर्फ 2 जगह पार्टी ने मेयर पद के प्रत्याशी उतारे हैं. जबकि बाकी जगह बड़ी संख्या में पार्षद प्रत्याशी उन इलाकों पर फोकस कर रहे हैं, जहां पर मुस्लिम आबादी ज्यादा हैं.

स्थानीय निकाय चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता तीसरे राजनैतिक विकल्प के बारे में क्या सोचती है. बता दें कि राज्य की राजनीति हमेशा 2 पार्टियों के बीच बंटी हुई रही है. कांग्रेस और बीजेपी के अलावा तीसरी पार्टी कभी मध्य प्रदेश की जनता के दिल में जगह नहीं बना सकी. कई पार्टियां बनीं और खत्म हो गईं लेकिन सत्ता पर न तो काबिज़ हो सकीं औऱ ना ही सत्ता बनाने या सत्ता को गिराने में उनका कभी कोई रोल दिखाई दिया. बीजेपी और कांग्रेस के अलावा मध्य प्रदेश में जिन क्षेत्रीय पार्टियों ने पैठ बनाने की कोशिश की, उसमें बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, जेडीयू और भारतीय जनशक्ति पार्टी प्रमुख रहीं. लेकिन उनसे जनता को कोई खास फर्क नहीं पड़ा.

बहुजन समाज पार्टी

बीएसपी को बीते चुनावों में सिर्फ 2 सीटें मिली थीं. इसमें से एक विधायक बीजेपी में शामिल हो चुका है यानि वर्तमान में बीएसपी के पास सिर्फ 1 विधायक है. उसके भी बीएसपी में होने और नहीं होने पर संशय है. पार्टी को 2013 में 4, 2008 में 7, 2003 में 2, 1998 में 11, 1993 में 11, 1990 में 2 सीटें हासिल हुईं थीं.

समाजवादी पार्टी

इसी तरह समाजवादी पार्टी को 2018 में 1 सीट मिली था. हालांकि अब समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीतने वाले राजेश शुक्ला बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. पार्टी को 2013 में 0, 2008 में 1, 2003 में 7, 1998 में 4 सीट हासिल हुई थी.

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी

जीजीपी आदिवासियों की पार्टी के तौर पर जानी जाती है. जिसका प्रभुत्व उन इलाकों तक ही सीमित है. हालांकि 2003 में जीजीपी को 3 सीट मिली थीं.

जनता दल यूनाइडेट

बीजेपी और कांग्रेस से इतर अगर किसी पार्टी को बड़ी संख्या में वोट मिले तो वो जेडीयू है, हालांकि इस बात को एक अरसा बीत चुका है. 1990 में अविभाजित मध्य प्रदेश में जेडीयू ने 28 सीटें जीती थीं. धीरे धीरे जेडीयू का वर्चस्व एमपी में लगभग खत्म हो चुका है.

भारतीय जनशक्ति पार्टी

पार्टी से निष्कासित होने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने अपना दल तैयार किया था. साल 2008 में भारतीय जनशक्ति पार्टी ने विधानसभा चुनावों में ताल ठोंकी, पार्टी काफी तेज़ी से उभर कर आई लेकिन जनता के दिल में जगह नहीं बना सकी. 2008 में भारतीय जनशक्ति पार्टी ने 201 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन महज़ 5 सीटों पर जीत दर्ज की. 184 सीटों पर पार्टी की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी.

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ये आंकड़े तो विधानसभा चुनावों के हैं जहां मुद्दे और नेता स्थानीय चुनावों से बेहद जुदा होते हैं लेकिन जनका का मूड भांपने के लिए स्थानीय निकाय चुनाव सबसे अहम होता है, जिसमें समस्याएं और निदान दोनों ही बेहद स्थानीय होते हैं. ऐसे में अगर AIMIM और आम आदमी पार्टी उम्मीद कर रही हैं कि इन चुनावों के ज़रिए वो एमपी की राजनीति में सेंधमारी कर सकती हैं तो वो गलत नहीं हैं. बशर्ते जनता उन पर विश्वास करके तीसरे मोर्चे के विकल्प को साकार करे.

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