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Maharashtra Political Crisis: पुराना प्यार है इनका हिंदुत्व, जानिए उस अब्दुल सत्तार को जिसकी चाहत है औरंगजेब का नाम ओ निशान मिटाना !

एकनाथ शिंदे अब्दुल सत्तार (फाइल फोटो)

अब्दुल सत्तार का हिंदुत्व प्रेम नया नहीं है. प्रेम 2014 से शुरू हुआ था और इस साल के जनवरी महीने में भी एक बार फिर जागा था.

महाराष्ट्र के राजनीतिक भूकंप (Maharashtra Political Crisis) के बीच जो सबसे अहम सवाल सामने आया है, वो यह कि आखिर शिवसेना के बागी विधायकों के नेता एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) शिवसेना से क्या चाहते थे? शिवसेना से उनकी नाराजगी क्यों है? एकनाथ शिंदे गुट का कहना है कि शिवसेना ने हिंदुत्व का साथ छोड़ दिया है. जब से शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई है तबसे हिंदुत्व पीछे छूट गया है और शिवसेना के लिए सीएम का पद कायम रखना ज्यादा अहम हो गया है. यही वो अहम सवाल है जिसके आधार पर एकनाथ शिंदे गुट बागी हो गया. एकनाथ शिंदे की मांग यही है कि शिवसेना महा विकास आघाड़ी से बाहर आए और हिंदुत्ववादी पार्टी बीजेपी के साथ मिल कर राज्य में सरकार बनाए. इस मांग को लेकर 55 विधायकों में से 40 से ज्यादा विधायक एकनाथ शिंदे के साथ हैं और शिवसेना समर्थक 8 में से 6 निर्दलीय विधायक भी शिंदे गुट के साथ हैं. इन्हीं विधायकों में से एक नाम की काफी चर्चा है. यह नाम है अब्दुल सत्तार (Abdul Sattar).अब्दुल सत्तार महाराष्ट्र के सिल्लोड से विधायक हैं और महा विकास आघाड़ी सरकार में राज्य मंत्री हैं.

लोगों में यह जानने की उत्सुकता बनी हुई है कि एक मुस्लिम मंत्री को हिंदुत्व की इतनी चिंता क्यों है? आखिर अब्दुल सत्तार हिंदुत्व को बचाने के लिए इतने बेकरार क्यों हैं कि शिवसेना को तोड़ कर उद्धव ठाकरे छोड़ जाने को तैयार हैं? हिंदुत्व के मुद्दे पर एकनाथ शिंदे शिवसेना से अलग हो रहे हैं और इसी मुद्दे पर अब्दुल सत्तार उनका साथ दे रहे हैं. हिंदुत्व के मुद्दे को लेकर अब्दुल सत्तार का यह प्रेम नया नहीं है. पहले भी उनका यह प्रेम नजर आया है.

औरंगाबाद के नामांतरण मुद्दे पर शिवसेना का रुख हिंदुत्व से हुआ विमुख

हिंदुत्व के रास्ते से शिवसेना भटक गई है, इसकी बड़ी मिसाल अब्दुल सत्तार के चुनाव क्षेत्र से ही मिलती है. जिस वक्त अब्दुल सत्तार ने शिवसेना ज्वाइन की थी उस वक्त शिवसेना औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर किए जाने के लिए उग्र आंदोलन कर रही थी. यह आंदोलन महा विकास आघाड़ी में जाने के बाद खत्म हो गया. अब्दुल सत्तार औरंगाबाद के सिल्लोड क्षेत्र से ही चुन कर आते हैं. उनका एकनाथ शिंदे गुट में जाना इस बात की घोषणा है कि वे औरंगाबाद का नामकरण औरंगजेब के नाम की बजाए संभाजीनगर किए जाने की मांग आक्रामकता से उठाने वाले गुट के साथ हैं.

ऐसे सामने आया था अब्दुल सत्तार का पुराना हिंदुत्व प्रेम

इससे पहले इसी साल जनवरी महीने में अब्दुल सत्तार का हिंदुत्व प्रेम जागा था और उन्होंने उम्मीद जताई थी कि अगर बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व चाहे तो सीएम उद्धव ठाकरे को कांग्रेस और एनसीपी का साथ छोड़ने के लिए मनाया जा सकता है और एक बार फिर बीजेपी और शिवसेना की सरकार बनाई जा सकती है. उन्होंने यह सुझाया था कि महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे के दिल में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के लिए काफी सम्मान है. इससे पहले जब तीन दशकों तक बीजेपी और शिवसेना का साथ चला था तब भी प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे समेत नितिन गडकरी का बड़ा योगदान था. लेकिन तब शिवसेना ने अब्दुल सत्तार के इस बयान को ना सिर्फ व्यक्तिगत बताया था बल्कि इसके लिए अब्दुल सत्तार को डांट भी पिलाई गई थी. अब जब एकनाथ शिंदे ने हिंदुत्व के नाम पर शिवसेना के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया तो अब्दुल सत्तार तुरंत एकनाथ शिंदे के कैंप में चले गए.

पुराने कांग्रेसी अब्दुल सत्तार ऐसे बने हिंदुत्ववादी

हाल ही में जब राणा दंपत्ति को उद्धव ठाकरे के घर मातोश्री के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने से रोका गया और उन्हें जेल भेजा गया तो कुछ शिवसैनिकों को भी यह नागवार गुजरा. मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतारने वाले मुद्दे , औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर करने का आंदोलन को बंद कर देने जैसे कई ऐसे मामले सामने आए जिसमें शिवसेना अपने पुराने स्टैड से हट गई. कई पुराने शिवसैनकों को शिवसेना का यह सॉफ्ट सेक्यूलर रूप नहीं भाया, उन्हें बालासाहेब ठाकरे की कट्टर हिंदुत्ववादी शिवसेना की पहचान मिटने का खतरा महसूस हुआ और ऐसे में एकनाथ शिंदे का सपोर्ट बेस बढ़ता गया. इस हिंदुत्व के मुद्दे पर एकनाथ शिंदे को सपोर्ट करने वाले नेता अब्दुल सत्तार भी हैं.

अब्दुल सत्तार 2014 में महाराष्ट्र के कांग्रेस-एनसीपी सरकार में मंत्री रह चुके हैं. 2019 में वे कांग्रेस छोड़ कर शिवसेना में आ गए. महाराष्ट्र के सिल्लोड से वे तीन बार चुनाव जीत चुके हैं. महा विकास आघाड़ी सरकार में वे शिवसेना के कोटे से राजस्व, ग्रामीण विकास, बंदरगाह और विशेष सहायता राज्य मंत्री हैं. इससे पहले वे पशुपालन विभाग के कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं.

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